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लघुसिद्धान्तकौमुदी |
उदात्तसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
6- उच्चैरुदात्तः 1|2|29||
अनुदात्तसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
7- नीचैरनुदात्तः 1|2|30||
स्वरितसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
8- समाहारः स्वरितः 1|2|31||
स नवविधोऽपि प्रत्येकमनुनासिकत्वाननुनासिकत्वाभ्यां द्विधा |
उच्चैरुदात्तः | इस सूत्र में ऊकालोऽज्झ्र्स्वदीर्घप्लुतः से अच् की अनुवृत्ति आती है |
कण्ठ, तालु आदि स्थानों के ऊपरी भाग से उच्चारित अच् की उदात्तसंज्ञा होती है।
नीचैरनुदात्तः | इस सूत्र में ऊकालोऽज्झ्र्स्वदीर्घप्लुतः से अच् की अनुवृत्ति आती है |
कण्ठ, तालु आदि स्थानों के निम्न भाग से उच्चारित अच् की अनुदात्तसंज्ञा होती है।
समाहारः स्वरितः | इस सूत्र में ऊकालोऽज्झ्र्स्वदीर्घप्लुतः से अच् की अनुवृत्ति आती है |
जहाॅं उदात्त और अनुदात्त दोनों एकत्र बराबर हो, ऐसे अच् की स्वरितसंज्ञा होती है।
उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरों की सूक्ष्मता एवं उनका ज्ञान- जिस अच् के उच्चारण में स्थानों के ऊर्ध्वभाग का प्रयोग हो उस अच् की उदात्तसंज्ञा, जिस अच् के उच्चारण में स्थानों के निम्न भाग का प्रयोग हो उस अच् की अनुदात्तसंज्ञा और जिस अच् के उच्चारण में उदात्त और अनुदात्त का समान उपयोग किया गया हो तो उस अच् की स्वरितसंज्ञा का विधान इन तीन सूत्रों से हुआ | यद्यपि लौकिक हिंदी आदि भाषाओं में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित की सूक्ष्मता पकड़ में नहीं आती किंतु संस्कृत-भाषा में इनका महत्व अधिक है और खास करके वैदिक मंत्रों के उच्चारण में | जिस प्रकार से ह्रस्व, दीर्घ के विपरीत होने पर बहुधा अर्थ भी भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार उदात्त, अनुदात्त और स्वरित के विपरीत उच्चारण होने पर अर्थ का अनर्थ भी हो जाएगा | इसलिए वैदिक शब्दों के उच्चारण में इन स्वरों पर विशेष ध्यान दिया जाता है | स्वरों के द्वारा समास आदि का भी निर्णय होता है | स्वर प्रकरण में प्रकृति, प्रत्यय, धातु, आदेश, आगम आदि में होने वाले स्वरों के विषय में विस्तृत चर्चा की जाएगी | ये उदात्तादि स्वर अत्यंत सूक्ष्म है | जो बहुत ही अनुभवी विद्वान् हैं, वे इनके भेद को आसानी से पकड़ लेते हैं किंतु सामान्य ज्ञानी लोगों को इन स्वरों का पता कठिनता से ही लग पाता है।
उच्चैरुदात्तः और नीचैरुदात्तः इन सूत्रों में उच्चैः का अर्थ ऊॅंचे स्वर में और नीचैः का अर्थ नीचे स्वर में बोलना ऐसा नहीं है, अन्यथा सूक्ष्म उच्चारण में उदात्त स्वर नहीं बन पाएगा।
जैसे ह्रस्व, दीर्घ एवं प्लुत को समझने के लिए मात्राएॅं लगी हुई होती हैं, उसी प्रकार उदात्त, अनुदात्त और स्वरित को समझने के लिए वैदिक ग्रंथों में विशेष चिन्हों का प्रयोग किया गया है | अनुदात्त अक्षर के नीचे तिरछी लाइन, स्वरित के ऊपर खड़ी लाइन होती है और उदात्त के लिए कोई चिन्ह नहीं होता है।
स नवविधोऽपि- वह नौ प्रकार का अच् अनुनासिक और अननुनासिक के भेद से दो-दो प्रकार का होता है।
जैसे एक इ यह वर्ण ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत के भेद से तीन-तीन प्रकार का हुआ है | पुनः ह्रस्व भी उदात्त, अनुदात्त और स्वरित के भेद से तीन प्रकार का, इसी प्रकार से दीर्घ भी तीन प्रकार का और प्लुत भी तीन प्रकार का, इस तरह कुल मिलाकर नौ प्रकार का हुआ | वह नौ प्रकार का अच् पुनः अनुनासिक और अननुनासिक के भेद से दो-दो प्रकार का हो जाता है | नौ अनुनासिक और नौ अननुनासिक करके कुल 18 प्रकार का हो जाता है | यही प्रक्रिया सभी अचों के संबंध में समझना चाहिए।
स नवविधोऽपि का अर्थ यह समझना चाहिए- वह नौ या छः प्रकार का अच् | ऐसा मानने का प्रयोजन आगे स्पष्ट होगा।
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